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नोयडा के किसान सरकार, सांसद और जनप्रतिनिधियों की लिस्ट से ग़ायब – कपिल गुर्जर

नोयडा के किसान सरकार, सांसद और जनप्रतिनिधियों की लिस्ट से ग़ायब – कपिल गुर्जर

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गौतमबुद्ध नगर। कहाँ है ? किसानों, गरीबों और मजदूरों की सरकार! सांसद और जनप्रतिनिधियों की सूची में जिला गौतमबुद्ध नगर के किसानों के लिए कोई स्थान नहीं है जब की गौतमबुद्ध नगर का किसान मूलभूत सुविधानों के अभाव में जीवन यापन कर रहा है। यह वही जिला है जहा घोड़ी बछेड़ा और भट्टा परसौल में किसानों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी फिर भी अपने अधिकारों से वंचित जीवन जीने को मजबूर हैं लेकिन सरकार किसानों की समस्याओं से बेखबर बिल्डरों और खरीदारों व व्यापारियों की समस्याओं के निदान में अनवरत प्रयासरत है।
सरकार, सांसद, विधायक और नेताओं की बेरुखी से आहत गौतमबुद्ध नगर का किसान जिसके नाम के बिना नोयडा अधूरा होगा आज अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। आज वह अपने आपको को उपेक्षित महसूस कर रहा है। गौतमबुद्ध नगर के किसानों का नोयडा आज पराया सा लगने लगा है। जहां कोई भी बैठक या कार्यक्रम किसानों की बिना अधूरा होती थी वहीँ आज उसी नोयडा के बड़े बड़े कार्यक्रम और बैठक से किसान गायब है।
किसानों की ज़मीन छीन ली गयी उनके बच्चों को रोजगार देने का वादा किया गया था जो आज तक पूरा नहीं हुआ। प्राधिकरण, अस्पताल और कंपनियों में हमारे बालकों की अपेक्षा बाहरी लोगों को रोजगार देने में प्राथमिकता दी जाती है जिसके कारण हमारे नौजवान आज उपेक्षित और बेरोजगार घूम रहे हैं।
ज़िले के बदलते स्वरूप से जहाँ किसान चिंतित हैं वहीँ नेताओं को किसानों की अपेक्षा शहरी नागरिकों से ज्यादा अपेक्षाएं हैं और शहरी लोगों को नेताओं से।
जब स्थानीय सत्ताधारी सांसद, विधायक और नेताओं के अजेंडे में ही किसान नहीं है तो फिर स्वाभाविक है कि सरकार के अजेंडे में कैसे होंगें। पांच साल में किसानों की आमदनी दोगुना करने का दावा करने वाले लोग उन्हें उनका वाजिब हक देने को भी तैयार नहीं । जब वर्चस्ववादी सांसद के अजेंडे में इस क्षेत्र के मूल निवासी किसान कभी रहे ही नहीं तो उनकी कृपा से दूसरे दलों से आये विधायक बने नेताओं की इतनी हिम्मत कहाँ है वह कि किसानों के मुद्दों को लेकर आवाज उठा सकें।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्राधिकरण द्वारा किसानों की आबादी का निस्तारण करने की बजाय उन्हें भू-माफिया बताकर नोटिस भेजे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 10% आवासीय भुखण्ड नहीं दिए जा रहे । भूमि हीन किसानों के लिए यह कुछ करने को तैयार नहीं हैं। नए भूमि अधिग्रहण कानून को सरकार लागू कर नही रही है। सत्ताधारी बाह्य जनप्रतिनिधियों को बायर्स की चिंता है किसानों की नहीं आखिर वही वोट बैंक की सोच। वोट तो आपको इन किसानों ने भी दिया है अथवा बढ़ते शहरीकरण के चलते आपकी नजरों में इन किसानों की वोट की कोई अहमियत नहीं है। बिडंबना देखिये नेताजी यमुना प्राधिकरण के आवंटियों के प्लाटों को न मिलने को लेकर बहुत चिंतित हैं लेकिन किसानों के मुद्दे पर खामोश।
पेरिफेरल एक्सप्रेस वे से प्रभावित किसानों के आंदोलन में एक भी सत्ताधारी जनप्रतिनिधि व नेता ने जा उनके हक हकूक की बात नहीं की जिस प्रकार बायर्स की चिंता की गई बायर्स को उनका हक मिलना चाहिए यह यहाँ का किसान चाहता है लेकिन वो ये भी पूछ रहा है कि आपके अजेंडे में क्यों नहीं हैं ?

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