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तीन तलाक: कांग्रेस की 32 साल पुरानी भूल को भाजपा ने किया ओवर-रूल

तीन तलाक: कांग्रेस की 32 साल पुरानी भूल को भाजपा ने किया ओवर-रूल

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नई दिल्ली । लोकसभा में तीन तलाक पर बिल पेश करते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ये एक ऐतिहासिक कदम है। इस बिल को किसी मजहब के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए। ये बिल उन पीड़ित महिलाओं को संरक्षण देगी जो वर्षों तक तलाक-ए-बिद्दत यानि एक ही बार में तीन तलाक की शिकार थीं। कानून मंत्री के इस संबोधन के बाद चर्चा में शामिल सांसदों के सुर अलग थे। एआइएमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इस बिल को खामियों से भरा बताया तो बीजू जनता दल के सांसद भर्तृहरि महताब ने इस बिल को उत्पीड़क बताते हुए कहा कि इसका बेजा दुरुपयोग होगा। लेकिन कांग्रेस की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई उसमें विरोध-सहमति के दोनों बोल थे।

लोकसभा में एक झटके में दिए जाने वाले तीन तलाक के खिलाफ प्रस्तावित कानून से संबंधित विधेयक पर बहस के दौरान विपक्षी दलों ने अपने रवैये से न केवल सत्तापक्ष, बल्कि आम लोगों को भी हैरान किया। कांग्रेस, वामदलों के साथ सपा, बीजद, अन्नाद्रमुक और राजद के सांसदों ने इस प्रस्तावित कानून के खिलाफ तरह-तरह की दलीलें पेश कीं, लेकिन जब संशोधन प्रस्तावों पर वोटिंग की नौबत आई तो वे विरोध दर्ज कराने से कन्नी काट गए। यही कारण रहा कि एआइएमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी और माकपा के ए संपत के संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में मुश्किल से दो-चार वोट ही पड़े। ओवैसी के एक संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में तो सिर्फ एक वोट पड़ा यानी केवल उनका अपना वोट। सपा, राजद के साथ मुस्लिम लीग के सांसद ने भी उनका साथ देना जरूरी नहीं समझा। यह भी उल्लेखनीय है कि संशोधन प्रस्ताव कई सांसदों ने पेश किए, लेकिन मत विभाजन की मांग केवल संपत और औवैसी ने ही की। सबसे हैरानी भरा रवैया तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का रहा। वे इस बिल पर कुछ बोले ही नहीं।

बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी ने इस तथ्य से अवगत होने के बाद लोकसभा में अपने सांसदों को चुप रहने का निर्देश दिया कि अधिकांश मुस्लिम महिलाएं इस कानून के पक्ष में हैं। इसी तथ्य के चलते कांग्रेस ने भी इस कानून के कुछ प्रावधानों पर दिखावटी विरोध दर्ज कराने में ही अपनी भलाई समझी। माना जा रहा कि सपा और राजद ने भी इसी कारण इस कानून का विरोध करने में एक सीमा तक ही उत्साह दिखाया। दरअसल ये सभी दल इससे आशंकित थे कि अगर वे इस बिल के विरोध में खड़े होते तो जहां मुस्लिम महिलाओं की नजर में खलनायक बनते वहीं हिंदू समाज की नजर में कट्टरपंथी मुसलमानों का साथ देते दिखते।

विरोध-समर्थन के दोनों बोल
कांग्रेस के कद्दावर नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि इसमें शक नहीं कि मुस्लिम महिलाओं को तलाक के खिलाफ संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन जिस तरह एक बार में तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है, वो तमाम लोगों के नैसर्गिक अधिकार पर हमला करेगा। कांग्रेस का यह तर्क बिल पर मतदान से पहले था। लेकिन लोकसभा में मतदान का नजारा अलग था। तलाक-ए बिद्दत के खिलाफ को लोकसभा ने बहुमत के साथ पारित कर दिया। अब ऐसे में सवाल है कि कांग्रेस के विरोध के सुर बनावटी थे या उनके रणनीतिकार इस हकीकत को समझते हैं कि अब जमाना बदल चुका है। 2017 में कांग्रेस उस तरह का कदम नहीं उठा सकती है जो 1986 में शाहबानो मामले में की थी। आइए सबसे पहले आप को बताते हैं कि शाहबानो मामला और कांग्रेस का प्रभाव संसद में कितना था।

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