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नोयडा के किसान : अपने ही शहर में बेगाना हो गया हूँ, जाऊ तो जाऊ कहाँ ??

नोयडा के किसान : अपने ही शहर में बेगाना हो गया हूँ, जाऊ तो जाऊ कहाँ ??

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नोयडा प्राधिकरण बनने के पीछे ज़िले के किसानों की बहुत ही दुखद कहानी है। आज ज्यातर किसान बेरोजगार और लाचार बदलते हुए नोयडा के स्वरूप को देख कर अपने पुराने नोयडा को ढूंढ रहे हैं। सरकार ने वादा किया था की नोयडा के किसानों को प्राधिकरण और संबंधित विभागों में नौकरियां मिलेगीं। शहरों के तर्ज पर गावों का विकास होगा, कंपनियों में किसानों के बालकों को प्राथमिकता दी जाएगी लेकिन सब का सब छलावा निकला आज सभी पदों पर बाहर के लोग आसीन हैं किसान बेरोजगार और निरीह जीविकापार्जन के अवसर तलाशने में लगा हुआ है।
प्राधिकरण ने किसानों में इतना खौफ पैदा किया हुआ है की किसान रातों को ठीक से सो नहीं पा रहे हैं। कुछ नहीं पता किस समय प्राधिकरण के अधिकारी पुलिस और बुलडोजर लेकर उनके मकानों और दुकानों को तोड़ने पहुँच जाएँ।
वर्षों से अपनी समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे किसानों की किसी ने नहीं सुनी जबकि बिल्डरों के फलैटस के खरीदारों की समस्याओं के निवारण के लिए सरकार ने रातों रात कमेटी का गठन कर दिया और समस्या का निवारण भी, लेकिन किसान की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
भारतीय किसान यूनियन नोयडा के किसानों के अधिकारों के लिए लंम्बे समय से संघर्ष कर रह है, परन्तु किसानो के हालात में कोई सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। नोयडा प्राधिकरण के स्थापना के बाद से नोयडा ने भूमि अधिग्रहण कानून के अंतर्गत जिला गौतमबुद्ध नगर के किसानों की ज़मीनों का अधिग्रहण किया गया। प्राधिकरण की बुनियाद नोयडा को एक औद्योगिक क्षेत्र में विकसित करने के उद्द्देश्य से रखी गयी थी। जैसे -जैसे समय बदलता गया वैसे -वैसे नोयडा भी बदलता गया। एक समय ऐसा आया जब नोयडा में ज़मीन के भाव आसमान छूने लग गए और भारत ही नहीं दुनिया के लोग नोयडा में पूंजी निवेश करने के लिए लालयित होने लगे।
ज़मीनों की मांग जैसे – जैसे बढ़ती गयी वैसे – वैसे नोयडा का विस्तार होता गया और एक समय ऐसा आया जब नोयडा दुनिया के नक्शे पर अपनी पहचान बना चूका था। अब एक नहीं बल्कि तीन प्राधिकरण नोयडा की छवि को निखारने के कार्य में अनवरत लगे हुए हैं। अब दुनियां की जानीमानी कंपनियां नोयडा में कम्पनी खोलने के लिए ज़मीन पाने के लिए कतार में खड़ी हैं।

नोयडा का किसान परेशान क्यों है ?

नोयडा किसानों की ज़मीनें कौड़ियों के भाव लेकर सोने के भाव बेचने लगा। फैक्ट्रियों की जगह पर ऊँची – ऊँची गगन चुंम्बी रिहायशी इमारतें खड़ी होने लगी, चौड़ी और चमचमाती सड़कें बनने लगी और भारत के कोने – कोने से लोग नोयडा में एक आशियाना पाने का सपना देखने लग गए लेकिन नोयडा का किसान इस चकचौंध में खोता चला गया। अब उसे समझ आने लगा की प्राधिकरण ने उसके साथ छल किया है। आज वह अपने ही शहर में बेगाना सा हो गया है जिसका ज़िम्मेदार कोई और नहीं सिर्फ प्राधिकरण है।
अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ अपने अधिकारों को पाने के लिए किसान संगठित हो कर अपनी ज़मीनों की कीमत बाजार के भाव से मांगने लगे। जब प्राधिकरण ने उनकी बात को अनसुनी कर दिया तो किसानों ने अदालत का दरवाज़ा खट -खटाया। अदालत ने किसानों की फ़रियाद को सुना और उनके हक़ में फैसला सूना दिया जिससे किसान ख़ुशी के मारे झूमने लगे लेकिन कुछ दलाल किसानों और नेताओं ने अदालत के फैसले के बाद भी ग़रीब और अनपढ़ किसानों को उनकले अधिकारों से महरूम रखा है।

मुआवज़ा नहीं मिला और न मिला प्लॉट

प्राधिकरण ने कौड़ियों के भाव ज़मीन लेकर सोने के भाव बेच दिया लेकिन सैकड़ों किसान ऐसे अभी भी हैं जिन्ह उनकी ज़मीन का मुआवज़ा नहीं मिला है। अदालत के फैसले बाद बढ़ा हुआ मुआवज़ा और आबादी का प्लॉट लेने के लिए किसान वर्षों से प्राधिकरण का चक्कर लगा रहें हैं। दलाल और नेताओं के कार्य अधिकारी कर देते हैं लेकिन सीधे -सादे किसानों को चक्कर लगवाया जाता है।
आबादी के प्लॉट को लेने के लिए किसानों से अधिकारीयो ने दो हज़ार से तीन हज़ार रुपया मीटर घूस लिया। जिसने घूस दे दिया उसका काम हो गया जिसकी हैसियत नहीं थी वह आज भी चक्कर लगा रहा है।

आबादी का खेल
नोयडा प्राधिकरण के भूमि अधिग्रहण के बाद गांव के आस-पास की ज़मीनों को प्राधिकरण ने गांव के विकास और विस्तार के लिए छोड़ दिया लेकिन उन ज़मीनों को अपने नाम कर लिया अर्थात आज गांव की आबादी की ज़मीन पर भले ही आपने अपना मकान बना लिया हो लेकिन कागजों में उस ज़मीन का असली मालिक प्राधिकरण बना बैठा है। इसका लाभ लेते हुए कभी भी नोयडा के अधिकारी दस गाड़ी पुलिस फ़ोर्स और बुलडोज़र लेकर किसी भी गांव में सुबह सवेरे पहुँच जाते हैं और उसे अतिक्रमण बता कर ध्वस्त कर दिया जाता है।
आज कल जब से भाजपा की सरकार बनी है तब से यह कार्य ज़ोरों से चल रहा है। इस विषय में भारतीय किसान यूनियन और प्राधिकरण के अधिकारीयों के साथ कई बार बैठक हुई है लेकिन सफलता नहीं मिली। अधिकारी इस बात को मानते हैं कि अधिकारीयों की गलती की वजह से आबादी की ज़मीनों पर नोयडा का नाम चढ़ गया लेकिन सुधार करने के लिए कोई तैयार नहीं है।
नोयडा का किसान आज अपने ही शहर में बेगाना हो गया है। अपने बाप दादा की ज़मीन को और मकान को अपना नहीं कह सकता है। क्यूंकि कागज़ों में उस ज़मीन का मालिकाना हक़ उसके पास है ही नहीं।

अधिकारी और कर्मचारी माला माल
नोयडा के विकास के साथ – साथ नोयडा के अधिकारीयों और कर्मचारियों का भी विकास हुआ। हिंदुस्तान का हर नौकरशाह जीवन में एक बार नोयडा का अध्यक्ष बनने का सपना देखता है लेकिन सपने उसी के साकार होते हैं जो यूपी के “आका” को जो चढ़ावा चढ़ाने की हैसियत रखता हो। तेजी से हो रहे नोयडा के विकास के साथ -साथ नोयडा में भ्र्ष्टाचार का भी विकास हुआ और वह भी कोई मामूली नहीं बल्कि यह कहना उचित होगा नोयडा देश का सबसे बड़ा भ्र्ष्टाचार का केंद्र बन गया। एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष नोयडा में लगभग पांच हज़ार करोड़ रूपये का भ्र्ष्टाचार हुआ है। जिसमें सरकार, मंत्री, अधिकारी और कर्मचारी सभी का हिस्सा है। नोयडा का एक चपरासी भी आज करोड़पति है फिर आप बाबुओं और नौकरशाहों का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
नोयडा के अधिकारी किसानों को दुधारू गाय के रूप में देखते हैं। उनेह किसानों की समस्याओं और गावों के विकास से कोई सरोकार नहीं होता है क्यूंकि उनेह कुछ ही दिन नोयडा में रहना होता है और जब तक रहते हैं तब तक अपना कोटा पूरा भी करना होता है। इसलिए आज नोयडा का किसान अपने ही शहर में बेगाना हुआ है और उसकी फ़रियाद सुनने वाला कोई नहीं हैं।

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