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भाजपा और संघ के निशाने पर थीं पत्रकार गौरी लंकेश

भाजपा और संघ के निशाने पर थीं पत्रकार गौरी लंकेश

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नयी दिल्ली। समाजसेवी और वरिष्ठ महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद से देश भर में लोग आंदोलन कर रहे हैं। देश भर के समाज सेवी संगठन और पत्रकार संगठन गौरी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। बेंगलुरु के टाउन हॉल में लंकेश के परिजनों ने हत्यारों के खिलाफ प्रदर्शन कर के न्याय की मांग किया। इसके अलावा केरल के पत्रकारों ने भी सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया।
साबरमती आश्रम और दिल्ली प्रेस क्लब व दिल्ली के इण्डिया गेट पर भी आज लोगों ने कैंडल मार्च किया। कन्नड़ भाषी लंकेश पत्रिका की सम्पादक गौरी लंकेश की मंगलवार को उनके घर में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। लंकेश कटटरवादी हिन्दू संगठनों के खिलाफ मुखर होकर लिख रही थी। जिसके कारण वह हमेशा उनकी आँखों में खटकती रहती थी। इस हत्या में हिन्दू कटटरवादी संगठन संघ के समर्थकों के हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस के अनुसार किसी ने हत्यारों को देखा नहीं, वह लोग अचानक लंकेश के घर में घुसे और सात गोलियां दाग कर चले गए।

हर गली में एक हत्यारा घूम रहा है

गौरी लंकेश कन्नड़ भाषा में अपने समाज के लोगों को सजग कर रहीं थी कि कर्नाटक दुसरा गुजरात बनने की राह पर है। लंकेश इस प्रगति की यात्रा में बिचलन पैदा कर रहीं थी। वह राष्ट्र के लिए जो अनिवार्य है वह नहीं कर रहीं थी। वे गैर ज़रूरी काम कर रही थीं। गौरी कर्नाटक को समझा रहीं थी कि भारतीय समाज को नाइंसाफियों और हत्याओं की आदत पड़ती जा रही है और उसकी आत्मा बीमार पड़ती जा रही है। कन्हैया को लंकेश अपना बेटा मानती थी जिसके खून का प्यासा राष्ट्रवादी गली गली में घूम रहे हैं। इस लिए भाजपा और संघ के लिए राह को बनी हुयी थी।

हिंदी को भी सोचना होगा -बीबीसी

गौरी लंकेश की मौत पर हिंदी को भी सोचना होगा। इस पर कि क्यों उसकी पत्रकारिता में गौरी लंकेश को जगह नहीं मिल सकती। भारतीयता के पैरोकारों को सोचना होगा कि क्यों भारतीय भाषाएँ पानसरे, दाभोलकर, कलबुर्गी और लंकेश की हिफ़ाज़त नहीं कर सकतीं!
गौरी के एक मित्र ने बताया कि हाल में उन्होंने सावधान रहने को कहा था गौरी से और गौरी ने इस सलाह को झटक दिया था, “अगर हम नहीं बोले तो कौन बोलेगा?”
कुछ ठसक भी थी इसमें. हम जो भाषा जानते हैं कैसे चुप रहें? और अगर वक्त पर नहीं बोले तो क्या विश्लेषक की तरह शब्दों के ठंडा होने का इन्तज़ार करें?
गौरी शब्दों को कायरता से सर्द होने से बचा रही थीं। भाषा की आँच ज़िंदा रख रही थीं। लेकिन ध्यान रहे गौरी ख़ुद नहीं जलीं उस आग में जो वे जुगा रही थीं।
यह याद रखना अभी भी ज़रूरी होगा कि वे मरना नहीं चाहती थीं। बोलते रहना चाहती थीं और उन्हें ठप कर दिया गया. इसे याद रखना बहुत ज़रूरी है।

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