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आस्था: जब साईकिल से हज करने निकल पड़े ग्यारह साथी

आस्था: जब साईकिल से हज करने निकल पड़े ग्यारह साथी

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by August 18, 2018 Blogs

(इमरान खान)आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है कुछ ऐसा ही हुआ है आज से कुछ साल पहले सन 1953 के दरमियान गोरखपुर के इस्माइलपुर मोहल्ले के 11 लोगों ने सऊदी अरब की मुकद्दस हज यात्रा के लिए कमर कसी और उनके हज के सफर का जाने का जरिया बना साइकिल यूं तो लोग जमाने से पैदल और ऊंट और घोड़े पर हज की सवारी के तौर पर सफर किया करते थे मगर हिंदुस्तान के लिए शायद यह पहला मौका होगा अल्लाह जानता है

उन 11 लोगों के पास पासपोर्ट भी नहीं था मगर एक जज्बा था जाने का बस अल्लाह ने किसी को उस काम के लिए जरिया बनाया उस वक्त के रियाया के हुक्मरान आर्यन लेडी के वालिद साहब उस काम में हिस्सा बटाया उस सफर के पासपोर्ट का सबूत आज भी मोहल्ला खोखर टोला में मौजूद है जिसमें उन तमाम मुल्कों की मोहर लगी हुई है जहां जहां से यह काफिला गुजरा

इस सफ़र को पूरा करने में तकरीबन 9 माह लगे और जिन्होंने यह सफर किया आज उनमें से कोई भी इस दुनिया में जीवित तौर पर नहीं है अल्लाह उनको इसका बेहतर बदला अता फरमाए इस काफिले के आखिरी सदस्य अब्दुल मोईद का इंतकाल अभी हाल ही में हुआ है इस ग्रुप के मुखिया बने हाजी खुदा बख्श पतंग वाले

यह पूरा ग्रुप बिना पासपोर्ट के अपने सफ़र पर रवाना हुआ यह काफिला बस्ती पहुंच चुका था अब्दुल मोईद के एक दोस्त जाहीद अली जो रेलवे में कार्यरत थे जाहिद ने कहा इरादा है तो साइकिल ला दे उन्होंने नखास से इकलौती दुकान मौलवी साहब की से हंबर साइकिल खरीद ली और साथ में ₹250 रख लिए उस वक्त इतने पैसों की बहुत कीमत हुआ करती थी और साथ में खाने के लिए सत्तू और चना रख लिया इनके तीनो दोस्त अब्दुल अजीज नेक मोहम्मद और मोहम्मद बख्श ने बस्ती तक इन्हें दूसरों लोगों के ग्रुप तक पहुंचाया

उस वक्त इन्होंने होल्डन में तमाम जरूरत का सामान को रखा और साइकिल के मरम्मत का सामान भी और निकल पड़े हज के मुकद्दस सफर की तरफ दिल्ली के रास्ते राजस्थान की बॉर्डर पर इन्हें पासपोर्ट के अभाव में रोक दिया गया इसकी सूचना एंबेसी द्वारा गवर्नमेंट को दी गई और आयरन लेडी के वालिद में उन्हें पासपोर्ट मुहैया करवा दिया और यहीं से उनका सफर शुरू हुआ जो पड़ोसी मुल्क से होता होता अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचा

मगर इस दरमियान उन्हें मुश्किलें और अलग-अलग हालात से भी गुजरना पड़ा पड़ोस के मुल्क में जुबान तो एक जैसी थी इसलिए यहां पर उन्हे कोई तकलीफ ना आई मगर उसके पड़ोस में जो दूसरे मुल्क थे जैसे के ईरान इराक वहां पर उन्हें बोली चाली में थोड़ी दिक्कत आई मगर वह लोग इन्हें समझ गए कि यह हज के सफर पर है लोग उनका आदर सत्कार करते उन्हें तोहफे देते उनकी दावत करते यह सफर रेगिस्तान में भी पहुंचा वहां के हालात को जलते हुए आखिर उस जगह पहुंचा जहां उनका मकसद था

तकरीबन 9 माह के सफर में यह मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा पहुंच गए आज भी उन लोगों के सफर को उनके घर के फर्द बखूबी अपनी जबान से बयान करते हैं उसे सुनने के बाद हमें अंदाजा लगता है इतनी सहूलियत और इतना आसान सफर होने के बाद में भी क्या चीज है जो हमें रोक रही है उस फर्ज को पूरा करने पर उन लोगों के जज्बे को सलाम जिन्होंने इतनी दुश्वारी और मुसीबतों को झेलने के बाद भी इस्लाम की बुनियाद के पांचवे खंबे यानी हज को पूरा किया अल्लाह ताला से दुआ है उन लोगों को इसका बेहतरीन अजर अता फरमाए और जन्नत में आला मक़ाम अता फरमाए आमीन।

(स्रोत:इमरान खान की फेसबुक वॉल से लिया गया है)

जानकारी के लिए मेल करें: editorgulistan@gmail.com

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